कोरिया। जिले की एक प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति में धान खरीदी को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। समिति से सेवा समाप्त किए गए कर्मचारी अजय साहू पर बर्खास्तगी के बाद भी लगातार समिति के कार्यों में हस्तक्षेप करने के आरोप लग रहे हैं। यही नहीं, धान खरीदी में शॉर्टेज (कमी) देखी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद अब तक भौतिक सत्यापन नहीं किया जाना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, अजय साहू को 14 नवंबर 2025 को सेवा नियमों के तहत अनुशासनहीनता और जनहित के कार्यों में बाधा डालने के आरोप में सेवा से तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया गया था। आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि बार-बार निर्देश देने और कारण बताओ नोटिस जारी करने के बावजूद वे कार्यालय में उपस्थित नहीं हुए और न ही कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत किया गया। इसके चलते समिति के महत्वपूर्ण कार्य, विशेषकर धान उपार्जन की तैयारी, प्रभावित हुई।
सेवा समाप्ति के बावजूद अजय साहू द्वारा समिति में दखल दिए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। सूत्रों का कहना है कि धान खरीदी के दौरान अनाज की मात्रा में कमी देखी जा रही है, लेकिन अब तक इसका भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते भौतिक सत्यापन किया जाता, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती थी। प्रशासन की यह निष्क्रियता पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है। इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। अजय साहू द्वारा लगातार यह दावा किया जाता रहा कि उनके “सीएम स्तर तक संपर्क” हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई संभव नहीं है। हालांकि, उनकी बर्खास्तगी की कार्रवाई यह स्पष्ट संकेत देती है कि शासन और प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी, चाहे कोई कितना ही प्रभावशाली होने का दावा क्यों न करे। खबरों के प्रकाशन के बाद अजय साहू की प्रतिक्रिया भी चर्चा का विषय बनी हुई है। आरोप है कि वे सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहे हैं और पत्रकारों व आलोचकों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि वे खुद को घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि अब यह साफ हो चुका है कि सही और गलत कौन है। धान खरीदी से जुड़े मजदूरों, जिन्हें आम बोलचाल में हमाल कहा जाता है, के मेहनताने को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। हर वर्ष धान खरीदी के दौरान मजदूरों की मेहनत की कमाई में कटौती और गड़बड़ी की शिकायतें मिलती रही हैं। आरोप है कि ऐसे मामलों में प्रबंधन स्तर पर बैठे कुछ लोगों ने मजदूरों के हक का पैसा हड़पने का काम किया। सेवा समाप्ति के बाद भी उसी मानसिकता के तहत दबाव और हस्तक्षेप की कोशिशें की जा रही हैं। इस वर्ष प्रशासन की निगरानी अपेक्षाकृत सख्त रही, जिसके चलते पहले की तरह अवैध कमाई के रास्ते बंद होते नजर आए। जानकारों का कहना है कि इसी कारण संबंधित लोग ज्यादा बौखलाए हुए हैं। प्रशासनिक सख्ती के चलते जब मनमानी नहीं चल सकी, तो बयानबाजी और दबाव की राजनीति शुरू कर दी गई। स्थानीय किसानों और मजदूरों का कहना है कि धान खरीदी जैसे संवेदनशील कार्य में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। भौतिक सत्यापन, नियमित निगरानी और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई ही व्यवस्था पर भरोसा कायम रख सकती है। यदि समय रहते प्रशासन ने शॉर्टेज के मामलों की गंभीर जांच नहीं की, तो इसका खामियाजा सीधे किसानों और मजदूरों को भुगतना पड़ेगा। कुल मिलाकर, अजय साहू की बर्खास्तगी के बाद भी समिति में हस्तक्षेप, धान खरीदी में कमी, भौतिक सत्यापन की अनदेखी और सोशल मीडिया पर बयानबाजी जैसे मुद्दे यह दर्शाते हैं कि मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही तय करने की जरूरत है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में आगे क्या ठोस कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ “शून्य सहनशीलता” की नीति जमीन पर लागू हो पाती है या नहीं।



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