कोरिया। बैकुंठपुर जिला चिकित्सालय में भर्ती मरीजों के लिए शासन द्वारा भोजन और पौष्टिक नाश्ते की व्यवस्था की गई है, ताकि इलाज के साथ-साथ मरीजों के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हो सके। इसके लिए सरकार हर वर्ष लगभग 1 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि स्वीकृत करती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि मरीजों को न तो निर्धारित मात्रा में भोजन मिल रहा है और न ही पौष्टिक नाश्ता। कई वार्डों में भोजन की गुणवत्ता बेहद खराब बताई जा रही है, कहीं दाल पतली है तो कहीं सब्जी नाममात्र की। कई बार तो मरीजों को समय पर भोजन तक नहीं मिल पाता, जिससे उन्हें बाहर से खाना मंगवाने को मजबूर होना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन की ओर से हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो फिर वह राशि आखिर कहां जा रही है? क्या भोजन सप्लाई से जुड़े ठेकेदारों की मनमानी चल रही है, या फिर अस्पताल प्रबंधन की मिलीभगत से मरीजों के हक पर डाका डाला जा रहा है? यह सवाल अब आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।
चिंताजनक बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद चिकित्सालय प्रबंधन पूरी तरह मौन साधे हुए है। न कोई सार्वजनिक जानकारी, न ही खर्च का स्पष्ट हिसाब। पारदर्शिता के अभाव ने भ्रष्टाचार की आशंकाओं को और मजबूत कर दिया है। स्वास्थ्य विभाग का दायित्व है कि वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और यह स्पष्ट करे कि मरीजों के लिए आई राशि का उपयोग सही तरीके से हो रहा है या नहीं। यदि मरीजों के भोजन में कटौती कर राशि का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो यह न केवल नैतिक अपराध है बल्कि सीधे-सीधे भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। अब देखना यह है कि शासन और जिला प्रशासन इस गंभीर मामले पर कब संज्ञान लेते हैं और मरीजों को उनका हक कब मिलेगा।

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