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फौव्हारा चौक की शासकीय भूमि पर अवैध भवन: कार्यवाही क्यों रुकती है, सवालों में प्रशासन की भूमिका


कोरिया। शहर के सबसे व्यस्त और बहुचर्चित फौव्हारा चौक स्थित खसरा नंबर 155/2 में बने अवैध भवन का मामला वर्षों से चर्चा में बना हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि स्पष्ट तथ्यों, जांच रिपोर्ट और कलेक्टर के आदेश के बावजूद अब तक ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी है। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रभावशाली लोगों के सामने कानून किस हद तक असहाय नजर आता है। पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में यह आरोप आम थे कि मंत्री और जनप्रतिनिधियों द्वारा कोरिया जिले के अधिकारियों को फोन कर धमकी देकर कार्यवाही रुकवाई जाती थी। लेकिन 2023 में भाजपा सरकार आने के बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, भू-माफिया अब स्थानीय विधायक के साथ सार्वजनिक रूप से घूमकर अपना प्रभाव दिखाते हैं और मंत्रियों से संपर्क कर अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं। इसी दबाव के कारण प्रशासनिक अधिकारी भी कार्यवाही से कतराते नजर आ रहे हैं। कलेक्टर के आदेश के बाद खसरा नंबर 155/2 की जांच नजूल विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा की गई, जिसमें यह एक बार फिर प्रमाणित हुआ कि भवन निर्माण की अनुमति मात्र 1546 वर्गफुट के लिए प्राप्त थी, जबकि शासकीय भूमि पर कब्जा कर लगभग 3500 वर्गफुट क्षेत्र में निर्माण किया गया है। यानी अनुमति से दोगुने से भी अधिक क्षेत्र में अवैध कब्जा और निर्माण स्पष्ट रूप से सामने है। इसके बावजूद नजूल और राजस्व विभाग के अधिकारी कोई निर्णायक कदम उठाने को तैयार नहीं हैं। मामले का इतिहास भी सवालों से भरा है। नजूल अधिकारी द्वारा 19 अगस्त 2021 को किए गए पंचनामा में यह लिखा गया कि निर्माण कार्य बंद है, जबकि वास्तविकता यह थी कि निर्माण लगातार चलता रहा और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहा। इसके बाद दो बार प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत की गई। इसके जवाब में 29 सितंबर 2025 को नजूल अधिकारी ने नोटशीट में उल्लेख किया कि निर्माण कार्य बंद करा दिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि काम जारी रहा और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गरीबों के छोटे-छोटे अवैध कब्जे और निर्माण प्रशासन को तुरंत नजर आ जाते हैं, तो शहर के मुख्य चौक पर शासकीय भूमि में बने विशाल अवैध भवन अधिकारियों को क्यों नहीं दिखते? क्या जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों का दबाव कानून से ऊपर है? या फिर प्रशासनिक अधिकारी जानबूझकर सही मामले में कार्यवाही करने से बच रहे हैं? यह मामला अब सिर्फ एक अवैध भवन का नहीं, बल्कि कानून के समान लागू होने की साख का बन चुका है।

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