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कोरिया जिले में हाईकोर्ट का आदेश या जनप्रतिनिधियों का दबदबा? समितियों में पुनर्नियुक्ति पर उठे गंभीर सवाल


कोरिया। जिले में एक बार फिर कानून और जनप्रतिनिधियों के प्रभाव को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार गोडवाना गणतंत्र पार्टी के एक पदाधिकारी द्वारा पूर्व में माननीय हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसमें यह उल्लेख किया गया था कि कोरिया जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है, इसके बावजूद यहां की विभिन्न सहकारी समितियों में नियमों के विपरीत अन्य वर्गों के लोगों को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय हाईकोर्ट ने तीन सहकारी समितियों के अध्यक्षों को हटाने का स्पष्ट आदेश दिया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए संबंधित तीनों समितियों से अध्यक्षों को पद से हटा भी दिया था। उस समय यह माना गया कि कानून का राज कायम हुआ है और आदिवासी बहुल क्षेत्र में संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया गया है। लेकिन अब हालात फिर से सवालों के घेरे में हैं। बताया जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों के दबाव और आदेश के बाद उन्हीं समितियों में पूर्व में हटाए गए अध्यक्षों के परिवारजनों को पुनः अध्यक्ष या प्रभावशाली पदों पर बैठाया जा रहा है। यह कदम न केवल हाईकोर्ट के आदेश की भावना के विरुद्ध बताया जा रहा है, बल्कि इसे खुलेआम अवहेलना भी माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम से आमजन में आक्रोश है और यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर कोरिया जिले में बड़ा कौन है—जनप्रतिनिधि या माननीय हाईकोर्ट। यदि न्यायालय के आदेशों को इस तरह दरकिनार किया जाएगा, तो कानून के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होना तय है। अब निगाहें जिला प्रशासन और राज्य शासन पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या हाईकोर्ट के आदेशों की वास्तविक रूप से पालन सुनिश्चित किया जाएगा या नहीं।

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