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धौराटीकरा समिति में एस्मा एक्ट से बर्खास्त कर्मचारी से कराई जा रही धान खरीदी, अधिकारियों की मौजूदगी में नियम–कानून की खुलेआम अनदेखी, प्रशासन मौन क्यों?

 


कोरिया। धौराटीकरा सहकारी समिति में धान खरीदी के दौरान गंभीर अनियमितताओं और कानून के उल्लंघन का मामला लगातार सामने आ रहा है। जानकारी के अनुसार समिति के कर्मचारी अजय साहू को 14 नवंबर 2025 को आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम (ESMA Act, 1981) के अंतर्गत कर्तव्य में लापरवाही, अनुशासनहीनता और शासन के निर्देशों के उल्लंघन के आरोप में समिति से बर्खास्त किया गया था। एस्मा एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई होने के बाद संबंधित व्यक्ति को किसी भी शासकीय या सहकारी कार्य में संलग्न किए जाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। छत्तीसगढ़ सहकारी समिति अधिनियम 1960 एवं उसके नियमों के अनुसार, किसी भी बर्खास्त कर्मचारी को समिति परिसर में बैठने, कार्य करने या निर्णय प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार नहीं होता। इसके बावजूद अजय साहू न केवल समिति परिसर में मौजूद है, बल्कि खुलेआम धान खरीदी जैसे महत्वपूर्ण शासकीय कार्य में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।


सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह पूरा मामला सहायक पंजीयक कोरिया आयुष प्रताप सिंह एवं जिला विपणन अधिकारी की मौजूदगी में हो रहा है। किसानों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारी सब कुछ जानते और देखते हुए भी मौन बने हुए हैं। सवाल यह उठता है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो बर्खास्त और एस्मा एक्ट से दंडित कर्मचारी को आखिर किसके संरक्षण में कार्य करने दिया जा रहा है? क्या यह छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की भावना के विरुद्ध नहीं है? धान खरीदी जैसी शासन की अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण योजना में एक दागी कर्मचारी की भूमिका से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। किसानों का आरोप है कि समिति में धान की नमी, सुखती और क्वालिटी सही करने के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है। एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उससे प्रति खेप लगभग एक हजार रुपये तक लिए गए। इसके अतिरिक्त हमाली के नाम पर भी तय दर से अधिक राशि वसूली जा रही है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार धौराटीकरा समिति में लंबे समय से नियमों को ताक पर रखकर अवैध कर्मचारियों की नियुक्ति की जा रही है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। शिकायतों के बावजूद सहायक पंजीयक कार्यालय द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किया जाना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब कानून, नियम और धारा स्पष्ट हैं, तो प्रशासन आखिर मौन क्यों है? किसानों और ग्रामीणों ने कलेक्टर, आयुक्त सहकारिता एवं राज्य शासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, बर्खास्त कर्मचारी को तत्काल समिति से बाहर किया जाए तथा संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि धान खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता और किसानों का भरोसा बहाल हो सके।

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