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खनिज नियमों की अनदेखी: जिले में खुलेआम संचालित हो रहे अवैध ईंट भट्ठे, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल


कोरिया। जिले में खनिज नियमों और पर्यावरणीय मानकों की खुलेआम अनदेखी करते हुए अवैध ईंट भट्ठों का संचालन लगातार जारी है। नियमों के अनुसार प्रत्येक ईंट भट्ठा संचालक को प्रतिवर्ष न्यूनतम 200 पौधे लगवाना अनिवार्य है, ताकि पर्यावरण संतुलन बनाए रखा जा सके, किंतु जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। अधिकांश ईंट भट्ठों के आसपास न तो पौधारोपण किया गया है और न ही हरियाली के कोई ठोस प्रयास दिखाई देते हैं। नियमों में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि जिन सड़कों से ईंट भट्ठों तक आवागमन होता है, वहां धूल प्रदूषण को रोकने के लिए प्रतिदिन कम से कम तीन बार पानी का छिड़काव किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, आसपास स्थित स्कूलों में पेयजल, शौचालय की समुचित व्यवस्था तथा आवश्यक रंग-रोगन का कार्य भी ईंट भट्ठा संचालकों की जिम्मेदारी में आता है। लेकिन जिले के कई क्षेत्रों में संचालित ईंट भट्ठों में इन नियमों का पूर्णतः उल्लंघन हो रहा है, जिससे स्कूली बच्चों और स्थानीय ग्रामीणों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नियमानुसार जहां ईंट निर्माण किया जा रहा है, वहां फास्टट्रैक या सुरक्षित कार्य पथ की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि दुर्घटनाओं की संभावना को कम किया जा सके। वहीं, ईंट भट्ठों में कार्यरत सभी मजदूरों का श्रम पंजीयन अनिवार्य है, जिससे उन्हें शासन की श्रम कल्याण योजनाओं का लाभ मिल सके। बावजूद इसके, अधिकांश ईंट भट्ठों में मजदूर बिना पंजीयन के काम कर रहे हैं और सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी की जा रही है। सबसे गंभीर बात यह है कि इन तमाम अनियमितताओं के बावजूद खनिज विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। सूत्रों की मानें तो ईंट भट्ठा संचालकों द्वारा प्रति माह खनिज विभाग के कुछ अधिकारियों तक मोटी रकम पहुंचाई जा रही है, जिसके चलते अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। यही कारण है कि अवैध ईंट भट्ठों का संचालन बेखौफ होकर जारी है। जब इस संबंध में खनिज अधिकारी से चर्चा की गई तो उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार वर्ष 2027 तक पर्यावरणीय अनुमति के अंतर्गत ही ईंट भट्ठों को राहत दी गई है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि पर्यावरण अनुमति के अलावा अन्य नियमों की खुलेआम अवहेलना पर खनिज विभाग कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है। यह स्थिति न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है, बल्कि प्रशासन की निष्क्रियता को भी उजागर करती है। जिले में अवैध ईंट भट्ठों पर शीघ्र सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और श्रमिकों के अधिकारों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ना तय है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक आंख मूंदे बैठा रहता है और कब नियमों को सख्ती से लागू किया जाता है।

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