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विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी का कड़ा संदेश: 21 हजार की रिश्वत कांड में लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर को जमानत से किया इनकार


कोरिया। भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) शैलेश कुमार तिवारी ने लोक निर्माण विभाग मनेन्द्रगढ़ में पदस्थ सब इंजीनियर छत्रपाल बंजारे (सी.पी. बंजारे) की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि प्रकरण में प्रथम दृष्टया आरोपी की संलिप्तता परिलक्षित होती है और अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है, ऐसे में आरोपी को जमानत का लाभ दिया जाना न्यायोचित नहीं है। यह मामला एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) अंबिकापुर द्वारा दर्ज अपराध क्रमांक 61/2025 से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार, मनेन्द्रगढ़ व्यवहार न्यायालय परिसर में बार रूम विस्तार निर्माण कार्य का ठेका शिकायतकर्ता को दिया गया था। उक्त निर्माण कार्य की अनुमानित लागत लगभग 8.56 लाख रुपये थी। कार्यादेश जारी होने के बाद जून 2025 में निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया और कार्य के एक चरण के पूर्ण होने पर लगभग 2.99 लाख रुपये का भुगतान भी किया गया। अक्टूबर 2025 में निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद भौतिक सत्यापन एवं मूल्यांकन की प्रक्रिया के लिए लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर छत्रपाल बंजारे से संपर्क किया गया। इसी दौरान आरोपी द्वारा कार्य के मूल्यांकन एवं माप पुस्तिका में प्रविष्टि करने के एवज में 25 हजार रुपये की रिश्वत की मांग किए जाने का आरोप सामने आया। इस अवैध मांग से आहत होकर ठेकेदार ने एंटी करप्शन ब्यूरो अंबिकापुर में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर एसीबी द्वारा विधिवत सत्यापन कराया गया, जिसमें रिश्वत मांग की पुष्टि हुई। इसके बाद एसीबी की टीम ने जाल बिछाकर ट्रैप कार्रवाई की। 30 अक्टूबर 2025 को आरोपी को 21 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया। मौके पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई करते हुए रिश्वत की रकम जब्त की गई तथा आरोपी के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित अधिनियम 2018) की धारा 7 के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया। जमानत आवेदन पर सुनवाई के दौरान लोक अभियोजक ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि आरोपी एक जिम्मेदार शासकीय पद पर पदस्थ है और उसके द्वारा की गई रिश्वत मांग न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास के साथ भी धोखा है। अभियोजन ने डिजिटल वॉयस रिकॉर्डिंग, ट्रैप कार्रवाई, जब्ती पंचनामा सहित अन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया। वहीं बचाव पक्ष ने धारा 483 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत जमानत दिए जाने की मांग की, लेकिन अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों और परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया। विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी ने आदेश में कहा कि आरोपी की प्रथम दृष्टया संलिप्तता स्पष्ट है, शेष तथ्य साक्ष्य के परीक्षण का विषय हैं, और आरोपी की पदस्थापना तथा अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं होगा। अदालत ने आदेश की प्रतिलिपि संबंधित अधिकारियों को भेजने और प्रकरण को अभिलेखों में संलग्न करने के निर्देश भी दिए। यह फैसला जिले में भ्रष्टाचार के विरुद्ध न्यायपालिका के कठोर रुख का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। न्यायालय का यह संदेश साफ है कि रिश्वतखोरी और पद के दुरुपयोग के मामलों में कानून किसी भी स्तर पर नरमी नहीं बरतेगा।

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