हाईकोर्ट के आदेश से स्पष्ट हुआ नियमों का उल्लंघन
कोरिया। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल कोरिया जिले की सहकारी समितियों में वर्षों से चले आ रहे नियमों के उल्लंघन पर अब न्यायिक मुहर लग गई है। आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित, जामपारा से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नियमों को दरकिनार कर गैर-आदिवासी वर्ग के लोगों को अध्यक्ष बनाया गया था, जो कानूनन गलत है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब यह रास्ता साफ हो गया है कि ऐसे सभी गैर-आदिवासी अध्यक्षों को हटाकर वास्तविक हकदार आदिवासी वर्ग के लोगों को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जाएगा। उक्त प्रकरण में शिवदर्शन सिंह द्वारा हाईकोर्ट में रिट याचिका क्रमांक 5513/2025 दायर की गई थी। याचिका में सहकारी समिति के चुनाव नहीं कराए जाने एवं नियमों के विपरीत अध्यक्ष नियुक्त किए जाने का मुद्दा उठाया गया था। मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति श्री अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने की। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को संयुक्त पंजीयक, सहकारी संस्थाएं, कोरिया संभाग के समक्ष नवीन अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं तथा संबंधित अधिकारी को सहकारी समितियां अधिनियम के प्रावधानों के तहत आवश्यक कार्रवाई करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह बात और अधिक स्पष्ट हो गई है कि कोरिया जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है और यहां की आदिम जाति सेवा सहकारी समितियों पर आदिवासी वर्ग का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है। इसके बावजूद पूर्व में नियमों को नजरअंदाज करते हुए अन्य वर्गों के लोगों को अध्यक्ष पद पर बैठाया गया, जो न केवल सहकारी कानून बल्कि आदिवासी अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन है।
क्या कहता है नियम और कानून
छत्तीसगढ़ सहकारी समितियां अधिनियम एवं राज्य शासन की नीति के अनुसार आदिवासी बहुल एवं अनुसूचित क्षेत्र में संचालित आदिम जाति सेवा सहकारी समितियों में अध्यक्ष पद पर आदिवासी वर्ग के व्यक्ति का ही चयन किया जाना अनिवार्य है। संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम (PESA Act) तथा राज्य सहकारी नियमों का उद्देश्य यही है कि आदिवासी क्षेत्रों में निर्णय लेने की बागडोर आदिवासी समाज के हाथों में रहे। स्पष्ट रूप से यह प्रावधान है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र में गैर-आदिवासी व्यक्ति को समिति का अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता।
अब आगे क्या होगा। हाईकोर्ट के निर्देशानुसार संयुक्त पंजीयक को 120 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर निर्णय लेते हुए आवश्यक कदम उठाने होंगे। माना जा रहा है कि इसके बाद कोरिया जिले की सभी संबंधित समितियों की समीक्षा की जाएगी और जहां-जहां नियम विरोधी तरीके से गैर-आदिवासी अध्यक्ष बनाए गए हैं, उन्हें हटाकर आदिवासी वर्ग के पात्र लोगों को अध्यक्ष पद सौंपा जाएगा। इस फैसले को आदिवासी समाज की बड़ी जीत माना जा रहा है। लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि सहकारी समितियों में वास्तविक हकदारों को उनका अधिकार मिलेगा और आदिवासी क्षेत्रों में कानून व संविधान की भावना के अनुरूप व्यवस्था बहाल होगी।

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