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धान खरीदी केंद्रों पर हमाली के नाम पर अवैध वसूली, किसान खुद उठाने को मजबूर धान की बोरी


कोरिया/एमसीबी। कोरिया और एमसीबी जिलों के 46 धान खरीदी केंद्रों पर समर्थन मूल्य पर धान खरीदी भले ही कागजों में सुचारू और पारदर्शी दिखाई जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी उपज बेचने के लिए न केवल घंटों लाइन में खड़े हो रहे हैं, बल्कि हमाली के नाम पर अवैध वसूली का भी सामना कर रहे हैं। कई केंद्रों पर तो किसान खुद ही हमाल बनकर तौल, सिलाई और ढुलाई करने को मजबूर हैं। शासन द्वारा धान खरीदी के दौरान हमाली मद में प्रति क्विंटल 34.77 रुपये की दर से राशि समितियों को जारी की जाती है। इसमें तौल, सिलाई, उठाव, ढुलाई और वेयरहाउसिंग जैसे कार्य शामिल हैं। बावजूद इसके, अधिकांश खरीदी केंद्रों पर न तो पर्याप्त हमाल उपलब्ध हैं और न ही इस राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस खरीदी सत्र में हमाली मद के तहत करीब 2 करोड़ 57 लाख रुपये जारी किए जा चुके हैं, लेकिन इसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाया। किसानों का आरोप है कि कई खरीदी केंद्रों पर उनसे 40 से 50 रुपये प्रति क्विंटल तक की अवैध वसूली की जा रही है। विरोध करने पर कभी बारदाना नहीं होने, तो कभी तौल में कमी या तकनीकी खामियों का हवाला देकर परेशान किया जाता है। ऐसे में विवाद से बचने के लिए किसान मजबूरी में अतिरिक्त पैसे देने को मजबूर हो जाते हैं। एक 
किसान रामसाय ने बताया कि 19 क्विंटल धान बेचने के लिए उन्हें करीब 1,000 रुपये मजदूरी के रूप में अलग से देने पड़े। यही नहीं, खर्च बचाने के लिए कई किसान अपने पूरे परिवार के साथ खरीदी केंद्र पहुंच रहे हैं, ताकि हमाली का काम खुद कर सकें। यह स्थिति शासन की किसान हितैषी नीतियों और दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। धान खरीदी केंद्रों पर प्रभावी निगरानी के अभाव में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है। आरोप है कि समिति प्रबंधन और संबंधित कर्मचारी हमाली मद की राशि का दुरुपयोग कर रहे हैं, जबकि किसान दोहरी मार झेल रहे हैं—एक ओर अपनी फसल का उत्पादन खर्च और दूसरी ओर अवैध वसूली का बोझ। आंकड़ों पर नजर डालें तो कोरिया जिले में अब तक 8,538 किसानों से 4,43,089 क्विंटल धान की खरीदी की जा चुकी है, जिसके बदले 104 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है। वहीं एमसीबी जिले में 2,93,582 क्विंटल धान की खरीदी हो चुकी है। इतनी बड़ी मात्रा में खरीदी के बावजूद यदि किसान ही बोरी उठाने और ढोने को मजबूर हैं, तो व्यवस्था की पोल अपने आप खुल जाती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन अनियमितताओं के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी खरीदी व्यवस्था को सफल बताकर संतोष जता रहे हैं। निरीक्षण और कार्रवाई की बातें केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन-प्रशासन इस कथित लूट पर संज्ञान लेकर दोषियों पर ठोस कार्रवाई करेगा, या फिर किसान हर साल इसी तरह अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए मजबूर होकर लुटता रहेगा।

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