Ticker

6/recent/ticker-posts

धान खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार बेलगाम, तीन-तीन अधिकारियों की मौजूदगी में चला ‘एडजस्टमेंट’ का खेल


कोरिया। जिले में धान खरीदी केंद्रों पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने के बाद भी अब तक ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी है। हैरानी की बात यह है कि प्रत्येक धान खरीदी केंद्र में शासन द्वारा तीन-तीन अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी, इसके बावजूद खुलेआम “एडजस्टमेंट” का खेल चलता रहा। सूत्रों के अनुसार, यह पूरा खेल अधिकारियों और समिति प्रबंधन की मिलीभगत से हुआ, जिसमें लाखों रुपये की कथित डील की गई।

सूत्र बताते हैं कि एक-एक केंद्र में ₹5 लाख, ₹3 लाख और ₹1 लाख तक की डील तय हुई थी, लेकिन भुगतान में भी भारी हेरफेर किया गया। जिसे ₹5 लाख देना था, उससे केवल ₹1 लाख लिया गया, ₹3 लाख वाले से ₹50 हजार और ₹1 लाख वाले से मात्र ₹10 हजार लेकर समझौता कर लिया गया। इस कथित लेन-देन के बाद कई गंभीर अनियमितताओं पर आंख मूंद ली गई।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिला अधिकारियों की मौजूदगी में ही बर्खास्त कर्मचारी लगातार खरीदी केंद्रों पर उपस्थित रहे। नियमों के अनुसार, जिन कर्मचारियों पर पूर्व में कार्यवाही हो चुकी है, उन्हें दोबारा जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन यहां नियमों की खुली अनदेखी की गई। विशेष रूप से धौराटिकरा धान खरीदी समिति में बर्खास्त कर्मचारियों का प्रभाव लगातार देखा जा रहा है, जबकि संबंधित अधिकारी आंख-कान बंद किए बैठे हैं।

अब 5 और 6 तारीख को एक बार फिर धान खरीदी प्रस्तावित है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार ट्रस्ट कर्मचारियों, समिति प्रबंधकों और खरीदी केंद्र प्रभारियों पर वास्तविक कार्यवाही होगी या फिर पहले की तरह मामला दबा दिया जाएगा। जानकारों का कहना है कि जिन पर कार्यवाही हुई, वे न तो किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल थे और न ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले थे। उल्टा, भ्रष्टाचारियों की मांग के बावजूद उन्होंने रिश्वत देने से इनकार किया, संभवतः इसी कारण उनके खिलाफ कठोर कदम उठाए गए।

जिला विपणन अधिकारी द्वारा धान खरीदी से संबंधित जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है। अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितनी धान खरीदी हुई, कितना हमाली भुगतान हुआ और कितनी बारदाना की आपूर्ति की गई। पारदर्शिता के अभाव ने संदेह को और गहरा कर दिया है। हालांकि, कलेक्टर कोरिया की निगरानी में प्रारंभिक दौर की धान खरीदी को पारदर्शी बताया गया, लेकिन जिन कर्मचारियों को किसानों की सुविधा और भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्हीं के रहते भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए। इससे प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एक व्यक्ति, जिस पर पड़ोसी जिले में लगभग ₹20 करोड़ के घोटाले का आरोप है, उसे दोबारा सिस्टम में बनाए रखा गया। जबकि नियम स्पष्ट हैं कि घोटाले में लिप्त व्यक्ति को पुनः जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। जिले के अधिकांश अधिकारियों को इस पृष्ठभूमि की जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब बड़ा सवाल यह है कि यदि ऐसे लोगों को फिर मौका दिया जाएगा, तो क्या भविष्य में और बड़े घोटाले नहीं होंगे? जिले की जनता और किसान अब उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष जांच और सख्त कार्यवाही की मांग कर रहे हैं, ताकि धान खरीदी व्यवस्था में भरोसा बहाल हो सके।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ