कोरिया। जिले में ग्राम पंचायत सचिवों के स्थानांतरण मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शासन की स्थानांतरण नीति के अनुसार किसी भी अधिकारी या कर्मचारी का स्थानांतरण होने के बाद उसे अधिकतम एक सप्ताह के भीतर नवीन पदस्थापना स्थल पर ज्वाइन करना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद कोरिया जिले में 3 नवम्बर 2025 को स्थानांतरित किए गए कई ग्राम पंचायत सचिवों ने न केवल समय पर ज्वाइनिंग नहीं की, बल्कि लगभग 90 दिनों तक अपने पुराने पंचायतों में बने रहे।
जानकारी के अनुसार जिन सचिवों की पहुंच मजबूत रही और जिन पर पहले से भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे, उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर ज्वाइनिंग नहीं की। इससे स्पष्ट है कि स्थानांतरण नियमों का पालन न तो संबंधित कर्मचारियों ने किया और न ही बैकुंठपुर जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे गंभीरता से लिया। शासन के नियमों में स्पष्ट है कि शासकीय कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी स्वयं तय करता है, लेकिन यहां जनपद अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक ग्राम पंचायत ओदगी के सचिव ने अब तक ज्वाइनिंग नहीं की है। वहीं ग्राम पंचायत भंडारपारा, तलवापारा और कटकोना के सचिव, जो पहले भी विवादों में रहे हैं, उन्हें लगातार समाचार प्रकाशित होने के बाद ही प्रभार से हटाया गया। खास तौर पर ग्राम पंचायत कटकोना के सचिव गणेश राजवाड़े का नाम पहले भी भ्रष्टाचार के मामलों में सामने आता रहा है। आरोप है कि भ्रष्टाचार को पूरी तरह अंजाम देने के बाद ही प्रशासन ने कार्रवाई की औपचारिकता निभाई।
इतना ही नहीं, ग्राम पंचायत पूर्वी में स्थानांतरण के बाद भी 15वें वित्त आयोग की राशि का खुलकर दुरुपयोग किया गया। बाजार में जिस सामग्री की कीमत लगभग 19,500 रुपये बताई जा रही है, वही सामग्री 39,900 रुपये में खरीदी गई। इससे भ्रष्टाचार की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
नियमों के अनुसार, स्थानांतरण के एक सप्ताह बाद जनपद अधिकारी को संबंधित ग्राम पंचायतों में वित्तीय कार्यों पर तत्काल रोक (होल्ड) लगाना चाहिए था, ताकि पुराने पदस्थ अधिकारी कोई लेन-देन न कर सकें। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। आरोप है कि जनपद अधिकारी द्वारा ग्राम पंचायत सचिवों को खुली छूट दी गई, जिससे पंचायत के विकास कार्यों के नाम पर सरकारी राशि की लूट होती रही। अब सवाल यह उठता है कि क्या जनपद अधिकारी की मिलीभगत से भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया गया, या फिर नियमों की अनदेखी को ही प्रशासनिक संस्कृति बना दिया गया है। लगातार सामने आ रहे मामलों के बावजूद कार्रवाई न होना, जिले में प्रशासनिक पारदर्शिता पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

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